धीरज
उसके पास प्लान, हिम्मत, आशा, विश्वास और अनुभव की पूरी टीम थी। उसने सोच लिया कि वो अपना सर्वस्व लगा देगा। इस संस्था से उसे बहुत प्यार है और लोग भी तो उससे प्यार करते हैं। आदर देते हैं हासिये पर होने के बावजूद। डूबते नहीं देख सकता।
दरवाजे पर दस्तक की, “मैं भीतर आ सकता हूं? सिर्फ दो मिनट, सर।”
“तुम! नहीं। समय नहीं है।”
वह अवाक था। इतनी अवहेलना! खाली ही तो थे।
कुछ वर्ष पहले वो संस्था का एक केंद्रिय सदस्य था। जिस राजनीति से उसे घृणा है उसी का वो शिकार है। जानता है। स्वीकार किया, शिकायत नहीं।
“होइहिं सोई जो राम रचि राखा”
एक गहरी स्वांस छोड़ते हुए वह मुड़ लिया। धीरज उसका परम मित्र है।
02-04-2026
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